Skip to main content

पर्यावरण शरणार्थी तथा भारत

पर्यावरण शरणार्थी तथा भारत 

CLIMATE CHANGE MIGRANTS

स्रोत -FLICKR

जलवायु शरणार्थी या पर्यावरणीय प्रवासी से तात्पर्य 

जलवायु शरणार्थियों या पर्यावरण प्रवासियों वे लोग हैं जो अपने स्थानीय क्षेत्र में अचानक या दीर्घकालिक परिवर्तनों के कारण अपने घर क्षेत्र छोड़ने के लिए मजबूर हैं। ये वे परिवर्तन हैं जो उनकी कल्याण या सुरक्षित आजीविका से समझौता करते हैं। इस तरह के परिवर्तन बढ़ते सूखे, मरुस्थलीकरण, समुद्र स्तर की वृद्धि, और मौसमी मौसम पैटर्न (यानी मानसून) में व्यवधान शामिल हैं। जलवायु शरणार्थी भागने या दूसरे देश में स्थानांतरित करने का विकल्प चुन सकते हैं, या वे अपने देश के भीतर आंतरिक रूप से माइग्रेट कर सकते हैं।

आंकड़े क्या कहते है 

इंटरगवर्नमेंट पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) ने 1990 में पाया था कि जलवायु परिवर्तन का सबसे बड़ा प्रभाव पलायन और विस्थापन के रूप में दिखाई देगा। यह आकलन अब प्रबल होता जा रहा है। जानकार मानते हैं कि 2020 तक 20 करोड़ लोग विस्थापित होंगे। दिसंबर 2019 में जारी वर्ल्ड माइग्रेशन रिपोर्ट 2020 बताती है कि हर साल हिंसा और संघर्ष की तुलना में प्राकृतिक आपदाओं से लोग अधिक विस्थापित हो रहे हैं। इसके साथ ही अधिक से अधिक देश इन आपदाओं का शिकार हो रहे हैं।
इंटरनल डिस्प्लेसमेंट मॉनिटरिंग सेंटर (आईडीएमसी) 2018 से प्राकृतिक आपदाओं से विस्थापित हुए लोगों आंकड़ा जुटा रहा है। आईडीएमसी के अनुसार, 2018 के अंत तक 16 लाख लोग प्राकृतिक आपदाओं के चलते विस्थापित हुए। 2018 में भारत में सबसे अधिक विस्थापन हुआ। नवंबर 2017 में ओवरसीज डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट और यूनाइटेड नेशंस डेवलपमेंट प्रोग्राम द्वारा प्रकाशित क्लाइमेट चेंज रिपोर्ट में कहा गया है कि 2016 में 2.4 करोड़ लोग बाढ़ और चक्रवात के कारण अचानक विस्थापित हो गए। ओवरसीज डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट का अनुमान है कि 2030 तक दुनियाभर में 32.5 करोड़ लोगों पर जलवायु परिवर्तन से संबंधित आपदाओं का खतरा मंडराएगा।
पर्यावरण शरणार्थी

भारत तथा पर्यावरण शरणार्थी 

विश्व बैंक का कहना है कि 2019 में दुनियाभर में जितने लोग विस्थापित हुए, उसमें 20 प्रतिशत भारत से हैं। भारत में 50 लाख लोग जलवायु आपदाओं से केवल 2019 में विस्थापित हो गए। 2008-2019 के बीच भारत में हर साल औसतन 36 लाख लोग विस्थापित हुए। इस विस्थापन का बड़ा कारण मॉनसून के दौरान आई बाढ़ रही है लेकिन इस दौरान चक्रवात भी विस्थापन का एक प्रबल कारण बनकर उभरा है। 

पिछले साल आए फानी, वायु, माहा और बुलबुल चक्रवात से क्रमश: 18.2 लाख, 28.9 लाख, 2,846 और 1.86 लाख लोग विस्थापित हो गए। मई 2020 में अंफन चक्रवात के चलते पश्चिम बंगाल और ओडिशा में 1.9 करोड़ लोग विस्थापित हुए और 1.7 करोड़ लोगों के घर उजड़ गए। निसर्ग चक्रवात को देखते हुए करीब 20 हजार लोगों को अपने घरों से निकाला जा चुका है। कुछ दिनों बाद बंगाल की खाड़ी में एक और चक्रवात आने की आशंका जताई जा रही है। आंशका है कि ये दोनों चक्रवात बड़ी संख्या में लोगों को विस्थापित करेंगे।

भारत तथा पर्यावरण शरणार्थी


आगे की राह 

  1. भारत को जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न होने वाले खतरों से विश्व को अवगत करवाने के साथ इस सम्बन्ध में नए नीतियों के निर्माण में संयुक्त राष्ट्र के माध्यम से पहल किया जाना चाहिए। 

  2. केंद्र तथा राज्य सरकारों को जलवायु परिवर्तन उत्पन्न करने वाले कारको पर रोक लगाने का प्रयास किया जाना चाहिए। 

  3. किसी भी तरह के आपदा से निपटने के लिए केंद्र तथा राज्य सरकारों के बीच समन्वय होना चाहिए। 

  4. विस्थापित लोगो के पुनर्वास के लिए स्पष्ट नीति का निर्माण किया जाना चाहिए। 

SOURCE DOWN TO EARTH ,WIKIPEDIA